।। बरखा दाई तै काबर रिसागे ।।
तरिया देखत हे आस लगाये
नंदिया हवय कतका झुखाए
दर्रा दर्रा परगे घलो भुंईया ह
बरखा दाई तैं काबर रिसाये
बरखा दाई.....
गरज गरज के रहि जावथस
काबर बदरी बन तैं उड़ जावथस
बूंदा बांदी ले काम चलय नही
देखत हन तोर कोति हांथ लमाये
बरखा दाई.....
बियासी होए नई हे सावन म
रोपा थरहा होगे हे पछुवाये
किसान रोवत हे माथा धरे
धान बैठत जात हे चुरमुराये
बरखा दाई.....
बन कचरा कतका बाढ़त हे
अब निंदत ले बया भुलावत हे
धनहा डोली भर्री कस होगे
दुकलहा लकछन खेती बर आये
बरखा दाई....
बोर के लेबल तरि घुसरगे हे,
नहर अपासी ढप पर गे हे।
सावन महिना ह जेठ कस लागे,
गरमी म जी सबके अकुलाये॥
।। बरखा दाई तैं काबर रिसाये ।।
रचनाकार - हेमंत मानिकपुरी
भाटापारा जिला बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़ मोबाइल - 8871805078
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