धान - पान
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हरियर हरियर खेतहार हे
धान ह लहलहावत हे
सुघ्घर बाली निकले हाबे
सब झन माथ नवावत हे
सोना जइसे सुघ्घर बाली
हवा में लहरावत हे
अपन मेहनत देखके सरवन
मने मन मुसकावत हे
मेहनत के फल मीठा होथे
'माटी' गाना गावत हे
धान ल अब लुए खातिर
हंसीया धरके जावत हे
देव सोनू अशोक सुनील
ठाड़ ददरिया गावत हे
करपा ल अब बांध बांध के
बियारा कोठार में लावत हे
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रचना - महेन्द्र देवांगन "माटी"
( बोरसी - राजिम )
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला - कबीरधाम (छ.ग.)
मोबा. - 8602407353

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