शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

जब तक चलत कलम चलही


जब तक चलत कलम चलही
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धर के कालर जड़ देबो
तड़-तड़ा-तड़ देबो
मंता कहू भोंगागे त 
राम नाम सत कर देबो

खौलत खून तन म लगे आगी हे
सब कहिथे बेमेतरिहा बागी हे 
सीधवा बर बड़ सीधवा हन 
टेड़गा बर तो तेंदू लाठी हे
महतारी अस्मिता ले खेलहू कहू
तुंहार नाव के गरुन पुरान पढ़ देबो
जब तक चलत कलम चलही 

नइ तो फेर बंदूक निकलही 
मोर घर कहू आगी लगाबे
जान ले तोरो घर जलही 
फोकटे झिन होसियारी दिखा
नइ तो मिरचा-नून संग तर देबो

बीरनरायन के भुइयां म
 फेर बगावत हो जाही
महतारी खातिर अब
रक्त तिलक ले सुवागत हो जाही
गंगा अस्नान करके फेर 
सब के दसनवाहन कर देबो 
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रचना - पं. वैभव "बेमेतरिहा"
मोबाइल :- 9301489305

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