शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

दाई-ददा


।। दाई-ददा ।।


छोड़ के तै गुमान ल संगी।
बन जा पिरीत जोड़इया ग।।
चारदिनिया हे जिनगी हमर।
दाई ददा ल झिन भुलइहा ग।।

जाही त नइ पावच ओला।
फेर गुन गुन के तै रोबे ग।।
ओही दाई के मया कोरा ल
कोनो जिनगी कइसे पाबे ग।।

सौ जनम ल कोन ह देखे।
पतियाए काकर भाखा ग।।
इही जिनगी  दुख  पीरा के।
करले इहेच हे पुन पाप ग।।

ए जिनगी एक बार हे संगी।
दाई ददा घलो एकबार हे ग।।
कइसे छुटबे तै मया के लागा।
ए जिनगी ओखर उधार हे ग।।

छोड़ के तै गुमान ल संगी।
बन जा पिरीत जोड़इया ग।।
चारदिनिया हे जिनगी हमर।
दाई ददा ल झिन भुलइहा ग।।

✏ मिलन कांत
   मल्हार बिलासपुर
मोबा. 9098889904
milankant.blogspot.com

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