शनिवार, 29 अगस्त 2015

छत्तीसगढ़ के भुंइया


।। मोर छत्तीसगढ़ के भुंइया ।।

मोर छत्तीसगढ़ भुंइया के,कतका गुन ल मैं गांवव
चन्दन कस जेकर माटी हाबे,मैं ओला माथ नवांवव

ये माटी म किसम किसम के, आनी बानी के चीज हाबे
अइसने भरपूर अऊ रतन, कोनो जगा कहां पाबे

इही में गंगा इही में जमुना, इही में हे चारो धाम
चारों कोती तेंहा किंजरले, सबो जगा हाबे नाम

आनी बानी के फूल इंहा, महर महर ममहावत हे
हरियर लुगरा धान के पाना, धरती ल पहिनावत हे

आनी बानी के रिती रिवाज, दुनिया ल लुभाथे
गुरतुर बोली इंहा के संगी, सबला बने सुहाथे

कहां जाबे ते काशी मथुरा, कहां जाबे कुंभ के मेला
सबो धाम तो इंहा हाबे, सबले बढ़िया राजिम मेला


रचनाकार - महेन्द्र देवांगन "माटी "
( बोरसी - राजिम )
गोपीबंद पारा पंडरिया 
कबीरधाम (छ.ग.)
मोबा. 8602407353

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