सोमवार, 28 सितंबर 2015

हे गजानंन


।। हे गजानंन ।। 

हाथी साहीं तोर सूँड़-मूड़,सब तन मनखे जस गणेश
हे ॐ रूप, मंगल स्वरूप,बड़ अजगुत लगे तोर भेष
हे गिरिजा सुत हम गिरे अऊ पद दलित ला अब सम्हाल
सिन्दूर बदन स्वाधीन हिंद के,जन-जन ला कर लाल-बाल

हे लम्बोदर ! अब हमर उदर पाले खातिर दे दू रोटी
हे पीताम्बरधारी अब तो दे लाज ढँके बर लंगोटी
मूषक वाहन ! बड़हर मन हम ला चपके हें मुसवा साहीं
चुहकिन सब रसा हमार अउर अब हाड़ा-गोड़ा खाहीं

हे गजानन ! दू गज भुइयाँ तक नइये आज हमार करा
'मिलही खेती-बारी-घर' ये कइथें कतको झन मिठलबरा
हर के सपूत ! हर हमार देश के, दुख दारिद,अज्ञान आज
फरसाधारी ! कर साफ फरेबी मनला, बचा हमार लाज

हे गणनायक ! किरपा करके 'गणतंत्र' सफल करदे हमार
हे एकदंत ! अब एक बरन कर दे बाम्हन,बनिया, चमार
हे दीनबंधु ! हम दीन दलित मनके सुनके सकरुण पुकार
हे अशरण-शरण दयालु देव ! अब आके हमला तहीं तार

हे बिघन -हरन हर बिघन सबो,हे कर सिद्ध काम
हे मोदक प्रिय,जग वन्दनीय,शत-शत प्रणाम

जनकवि - कोदूराम दलित जी 
टिकरी अर्जुंदा जिला दुरूग 
हमर छत्तीसगढ़ 

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