दारू ठेका अउ महिला मन के छेंका
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सरकार खोले हे दारू भट्ठी, सब ला दरूहा बनाएं बर
दारू से विकास करही, कुछ पइसा ला खायेबर
सरकार ला दिखय नहीं, मंदिर दअउ इसकूल
कोनो मेर दारू दुकान खोलथे, भट्ठी हाऊस फूल
दरूहा मन बर रोज तिहार, महिला मन बर गारी
लइका मन सब दारू पियत हे, घर घर इही बिमारी
कहूं कहूं महिला मन जागीन, अपन घर बंचाएं बर
आन्दोलन के रूप बनाइन, दारू भट्ठी हटाये बर
दारू भट्ठी हटाये बर, जा के देइन धरना
सरकार के लाइसेंस मिले हे, जेन करना हे कर ना
गली गली मा कोचिया मन से, दारू हम बेचवाबो
दारू से कमाबोन पइसा, पानी सहीं बोहाबो
महिला मन के छेंका में, सरकार मूंदथे आंखी
दारू पकड़ के काय करबे, सरकार ओकरे साथी
दारू के दुकान बर, महिला मन के हे छेंका
पुरूष मन ला गरज नइये, महिला मन के हे ठेका
तेकर सेती बंद नई होवय, गली मोहल्ला के दारू
दारू पी के घुमत रहिथे, मंगलू रतन समारू
घर मा खायबर झन राहय, दारू पीना जरूरी हे
धोये चाउंर बांचय नहीं, दरूहा के मजबूरी हे
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रचनाकार - गजानंद साहू तिल्दा
(असौंदा) जिला - रायपुर
मोबा. :- 9617075374

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