गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

जाड़ के मऊसम


जाड़ा के मऊसम 
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जाड़ा के मऊसम हे , बड़ा दुखदाई
बिस्तर ला छोड़े के , मन नई लागय भाई
पानी के छीटा लागे , तीर मारे जइसे
ठंडा के बेरा हे , नहांवव भइया कइसे

 बबा संग रौनिया तापत , बइठे डोकरी दाई
लईका ला रोटी दे दे , काहत हावय भाई
नाक करथे पुनुन पुनुन , सरदी के मारे
रेमटा टुरा भरे हावच , सिरक के आ रे

 मांघ के महीना आगे , अबड़ हावय जाड़ा
अबड़ जाड़ लागत हावय , चाय के पीयव काढ़ा
जाड़ा के मऊसम में , आथे धान के मिजाई
हाथ गोड़ ठुनठुनागे , आगी  तापव भाई

 कोनो संग म खेलय नहीं , जाड़ा  के मारे
एके झन का करहू , जान दे दंव का रे
जुरमिल कमाबो बेटा , तभे काम बनही रे
जीव ला लुकाये मा , कइसे काम बनही रे

 जीव लुकाये में नई बनय , खेती अपन सेती
चार दिन ले मेहनत कर लव , जाहू एती तेती
 महतारी ला फुरसद नइये , संझा अउ बिहनिया
टुरा मन मेछरावत रहिथे , पढ़ ले बेटी मुनिया
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  रचनाकार - गजानंद  साहू 
 असौंदा, तिल्दा नेवरा रायपुर 
मोबाईल :- 96170 75374

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