जाड़ा के मऊसम
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जाड़ा के मऊसम हे , बड़ा दुखदाई
बिस्तर ला छोड़े के , मन नई लागय भाई
पानी के छीटा लागे , तीर मारे जइसे
ठंडा के बेरा हे , नहांवव भइया कइसे
बबा संग रौनिया तापत , बइठे डोकरी दाई
लईका ला रोटी दे दे , काहत हावय भाई
नाक करथे पुनुन पुनुन , सरदी के मारे
रेमटा टुरा भरे हावच , सिरक के आ रे
मांघ के महीना आगे , अबड़ हावय जाड़ा
अबड़ जाड़ लागत हावय , चाय के पीयव काढ़ा
जाड़ा के मऊसम में , आथे धान के मिजाई
हाथ गोड़ ठुनठुनागे , आगी तापव भाई
कोनो संग म खेलय नहीं , जाड़ा के मारे
एके झन का करहू , जान दे दंव का रे
जुरमिल कमाबो बेटा , तभे काम बनही रे
जीव ला लुकाये मा , कइसे काम बनही रे
जीव लुकाये में नई बनय , खेती अपन सेती
चार दिन ले मेहनत कर लव , जाहू एती तेती
महतारी ला फुरसद नइये , संझा अउ बिहनिया
टुरा मन मेछरावत रहिथे , पढ़ ले बेटी मुनिया
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रचनाकार - गजानंद साहू
असौंदा, तिल्दा नेवरा रायपुर
मोबाईल :- 96170 75374

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