पूरवइया
सरर-सरर चलत पूरवइया,
सोर मचावत आवत हे।
गरर-गरर उड़त अईसन
धूररा टोर मचावत हे।
चम-चम चमकत बिजुरी
मन ला चमकावत हे।
टरर-टरर करत मेचका
आमंतरन बगरावत हे।
घड़-घड़ घुमरत बदरा
जीव म डर हमावत हे।
झर-झर बरसत पानी
मन म खुशी ला लावत हे।
महर-महर महकत माटी
बिसवास मन के जागत हे।
लहर-लहर झूमत फसल
चारो डहर लहरावत हे।
डगर-डगर चलत 'दुलरवा'
माटी के गुन गावत हे।
रचना- श्रवण साहू 'दुलरवा'
गांव - बरगा, थानखम्हरिया बेमेतरा

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