जय जय जगन्नाथ
मै अनाथ, तैं जगत के नाथ।
झन छोड़, प्रभु जींयत साथ।
मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।
झन छोड़ प्रभु जींयत साथ।।
तैं दाता, मैं हरव भिखारी।
सुख - दुख के तैं संगवारी।
तोर दया के दुलरवा मैं,
तहीं ददा तहीं महतारी।।
भटकत फिरंव, लमा हाथ।
झन छोड़ प्रभु जींयत साथ।।
मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।१
मन मोर परबुधिया हे,
मिठलबरा ए दुनिया हे।
सुवारथ के घपटे घटा,
अंजोर अंतस कुरिया दे।
संझा - बिहनिया नवांव माथ।
मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।
झन छोड़ प्रभु जींयत साथ।।२
परमारथ 'हरि' काम दे,
'अमित' ल सेवक नाम दे।
सहजोगी सदमारग म
तैं सहोदरा - बलराम दे।।
लाज राख झन बिगड़ै बात।
मत छोड़ प्रभु जींयत साथ।।
मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।
रचना - कन्हैया साहू "अमित"
हथनीपारा भाटापारा बलौदाबाजार

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें