मन के अभिलाषा
----------------------------------
भुईयाँ के मटासी माटी बनतेंव
कुरिया अंगना मुहाटी बनतेंव
छत्तीसगढ़ ला सजाये खातिर
डोगरी पहार घाटी बनतेंव
डूलत रहितेंव खोर अंगना मा
रंग जातेंव बाली के रंगना मा
जोर के संगी संगवारी ला
बांध लेतेंव मया के बंधना मा
गदूल बनाके डूबोतीस मोला
लईका के गोल बाटी बनतेंव।।1।।
छनकत रहितेंव मुंदराहा ले,
सुन लेतिन आरा पारा ले,
चकचक ले चमकत रहितेंव,
मजांतेव बने लीम डारा ले,
जीव कस राखे रहतिस मोला
दाई बर चुक ले साटी बनतेंव।।2।।
चारो डहर ला किंजर जातेंव,
कटकटले बंधाये भंवर जातेंव,
झुलतेंव झुलना दिनभरहा मैं
ठनठन बाजत सुग्घर जातेंव,
फभ जातेंव मै महतारी ला
बछिया बर गर घांटी बनतेंव।।3।।
डर बनतेंव मैं दुरजन खातिर,
छत्तीसगढ़ 'सिरजन' खातिर,
अंधरा कनवा के संग रहितेंव
छूटे बर मैं करजन खातिर,
कायर कपटी के बध करे बर
क्रांति कारी के लाठी बनतेंव।।4।।
---------------------------------------
रचना - सरवन साहू
गांव-बरगा,जि- बेमेतरा
मो- 8085104950

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें