कहानी - घी गँवागे पिसान म
लेखिका - शकुंतला शर्मा भिलाई
ए दे काल शिव के बेटा के बिहाव होइस हे, आज डोला आही, मोरो घर नेवता आए हावय। महूँ हर बहू देखे बर जाहौं, लइका मन बर चॉउर-पिसान के अँगाकर रोटी केरा-पान म डार के बनाए रहेंव तेला वो मन ल खवा-पिया देहेंव तेकर पाछू सँगवारी मन सँग महूँ पहुँच गयेंव बहू देखे बर।
"कइसन सुघ्घर बहू लाने हस ओ माया !" मैं हर शिव के महतारी ल कहेंव। फेर जब बहू हर पॉंव - परिस, तव मोर मन म भुसभुस गईस कि बहू हर अतेक दुरिहा ले कैसे पॉंव-परत हे , मोर गोड़ ल कैसे नइ छुवत ए ? अतका म का देखथौं कि पाछू म, सरला अऊ सुधा खुसुर-फुसुर करत हें। काय गोठियाथें कइके महूँ थोरिक कान दे के सुनेवँ तव सुधा कहिस " बहू ल बने ढँग के नइ दिखय, तइसे लागत हे शकुन !" गोठ आइस अउ चल दिस। "ओकर बहू ओ निपटय रे, हमन का करना हे छोंडव।" कइके बहू धरा के हमन अपन-अपन घर आ गएन।
एक दिन अचानक मैं हर 'आस्था' चैनल म देखेंव सीधा-प्रसारण आवत रहिस हे -" भैरवी के भजन।" वो छोकरी हर मीराबाई के भजन " मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई..." गावत रहिस हे। मोला अइसे लागिस जाना-माना ए छोकरी ल कहूँ तीर-तखार म देखे हावौं। थोरिक चेत करके देखेंव तव चीन्ह डारेंव - " अरे एहर तो माया के बहुरिया भैरवी ए। कइसन सुघ्घर राग म गावत हे ओ ! भजन ल सुन के माया मेर गयेंव, बधाई देहे बर। मैं माया ल कहेंव-" नवा बहू हर गजब सुघ्घर गाथे ओ माया ! मैं अभीच्चे देख-सुन के आवत हौं " माया कहिस "वोकर एही गुन ल देख-सुन के तो तोर बेटा हर भैरवी सँग बिहाव करे हे दीदी! तैं जानत हस के नहीं,नवा-बहू हर देखे नइ सकय। वोहर अँधरी हे।"
मोला अइसे लागिस जाना - माना मोला मुर्छा आवत हे आउ मैं गिरत हावौं फेर माया हर दूनों हाथ म पोटार के मोला सँभालिस अऊ कहिस--" तैं हर ए सोंच दीदी ! कि तोर बेटा इंजीनियर हे तव तोर बहू घलाव हर बहुत बड़ गायिका हे । तोर बेटा ल तो भइगे एही गँव के मन जानथें फेर तोर बहू हर तो सरी दुनिया नाव कमावत हावय । हमन कोनो घाटा म नइ अन दीदी ! - घी गँवागे पिसान म ।"
कहानी - कुन्तला शर्मा
मैत्रीकुंज भिलाई दुर्ग (छ.ग.)
संपर्क - 09302830030

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