बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

देस बर जीबो देस बर मरबो


देस बर जीबो देस बर मरबो

चल माटी के काया ल,हीरा करबो।
देस बर जीबो, देस बर  मरबो।
  
सिंगार करबों,सोन चिरंईया के।
गुन गाबोंन, भारत मईया के।
सुवारथ के सुरता ले, दुरिहाके।
धुर्रा चुपर के माथा म,भुईंया के।

घपटे अंधियारी भगाय बर,भभका धरबो।
देस बर जीबो, देस बर मरबो।

उंच - नीच ल, पाटबोन।
रखवार बन देस ल,राखबोन।
हवा म मया, घोरबोन।
हिरदे ल हिरदे ले, जोड़बोन।

चल  दुख-पीरा ल, मिल  हरबो।
देस   बर  जीबों, देस बर मरबो।

मोला गरब-गुमान  हे,
ए भुईंया ल पाके।
खड़े रहूं मेड़ो म ,
जबर छाती फईलाके।
फोड़ दुहुं वो आँखी ल,
जे मोर भुईंया बर गड़ही।
लड़हु-मरहु  देस  बर ,
तभे काया के करजा उतरही।

तंउरबों बुड़ती समुंद म,उक्ती पहाड़ चढ़बो।
चल देस बर जीबो, देस बर मरबो।

रचना - जितेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को (कोरबा)  09981441795

नवा जमाना आगे



नवा जमाना आगे

जुन्ना जुन्ना चलन नदागे
आधुनिक फैशन ह छागे
तईहा के बात ल बईहा लेगे
नवा जमाना आगे.
संगी नवा जमाना आगे..............

बिन फटफटी के चेलिक ह
तरिया घलऊ नई जावय
बिन मेकअप के मुटयारी ह
डेहरी तलुक नई निकलय
मान गऊन सतकार भूलागे
एदे लाज सरम ह हजागे.............

दाई-ददा कुरिया म फेकागे
कुकुर ल सोफा म सुतावत हे
बिचार, बेवहार चुल्हा म जाय
देखावा ह सबला ओरावत हे
फोक्कट के खाना मइनखे ल भागे
मेहनत ले भागे, आलस हमागे.......

सबला ल पडे हे मतलब के अपन
मया पिरीत होगे जी खेलवारी
छोकरा डोकरा सब मोबाईल धरे
एकर बिना अटके बुता संगवारी
मांस मदिरा सहज होगे  
संयुक्त परिवार ह सिरागे...........

रचना - महेतरु मधुकर
पचपेडी, मस्तूरी, बिलासपुर

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

मै फेर लईका बन जातेव


मै फेर लईका बन जातेव

हे राम कांही तै अइसे कर              पतंग के डोरी म बांध के
मै फेर लईका बन जातेंव।              मन अगास ल छू आ जातेंव
फेर वोही ददा के खंधईय्या             हे राम कांही तै अइसे कर
अउ दाई के अंचरा पाजातेंव।।        मै फेर लईका बन जातेंव।।

खाय कमाय के चींता ले                बड़े बड़े मनखे ल देखके 

रहितेंव मै हा दुरिहा।                     मन मे डर हा अमागे।
भौरा-बाटी म दिन कटतिस            कइसे कटही ये जिनगी
सब खेलतेन संगी जहुरिया।।          फीकर ह माथा म छागे।।

पाप पुन्य ले रहितेव अंजान            काला कहिथे झुठ लबारी 

मन निर्मल पा जातेंव।                   कभु जान नइ पातेंव।
हे राम कांही तै अइसे कर               हे राम कांही तै अइसे कर
मै फेर लईका बन जातेंव।।             मै फेर लईका बन जातेंव।।

फेर चंदा ल ममा कहितेंव              जवानी के लेवा म जी

फेर दुध के भरे कटोरी।                तन मन ह मोर सनाये
रतिहा चंदैनी ल गीनत रतेंव           बुढ़ापा ह दुख म बुड़े 
वो बताशा वाले लोरी।।                काल घलो दुरिहाये।।

दाई के छाती म लगे लगे               करिया बलहा चितकबरा 
ससन भर मै सो जातेंव।                मन ल नइ रंगातेंव।
हे राम कांही तै अइसे कर               हे राम कांही तै अइसे कर
मै फेर लईका बन जातेंव।।             मै फेर लईका बन जातेंव।। 

सब के मया दुलार पातेंव               रचनाकार - फन्नू बैरागी जी

सुख से दिन ह कट जातिस।          'भजन सम्राट' बंदोरा
राम रहीम के पाठ ह।                    जिला - कबीरधाम कवर्धा
मोर जिनगी मे उतर आतिस।।         संपर्क - 9179496846

सोमवार, 29 अगस्त 2016

कहानी - घी गँवागे पिसान म


कहानी - घी गँवागे पिसान म
लेखिका - शकुंतला शर्मा भिलाई 

ए दे काल शिव के बेटा के बिहाव होइस हे, आज डोला आही, मोरो घर नेवता आए हावय। महूँ हर बहू देखे बर जाहौं, लइका मन बर चॉउर-पिसान के अँगाकर रोटी केरा-पान म डार के बनाए रहेंव तेला वो मन ल खवा-पिया देहेंव तेकर पाछू सँगवारी मन सँग महूँ पहुँच गयेंव बहू देखे बर।

"कइसन सुघ्घर बहू लाने हस ओ माया !"  मैं हर शिव के महतारी ल कहेंव। फेर जब बहू हर पॉंव - परिस, तव मोर मन म भुसभुस गईस कि बहू हर अतेक दुरिहा ले कैसे पॉंव-परत हे , मोर गोड़ ल कैसे नइ छुवत ए ? अतका म का देखथौं कि पाछू म, सरला अऊ सुधा खुसुर-फुसुर करत हें। काय गोठियाथें कइके महूँ थोरिक कान दे के सुनेवँ तव सुधा कहिस " बहू ल बने ढँग के नइ दिखय, तइसे लागत हे शकुन !"  गोठ आइस अउ चल दिस। "ओकर बहू ओ निपटय रे, हमन का करना हे छोंडव।"  कइके बहू धरा के हमन अपन-अपन घर आ गएन। 

एक दिन अचानक मैं हर 'आस्था' चैनल म देखेंव सीधा-प्रसारण आवत रहिस हे -" भैरवी के भजन।"  वो  छोकरी हर मीराबाई के भजन " मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई..." गावत रहिस हे। मोला अइसे लागिस जाना-माना ए छोकरी ल कहूँ तीर-तखार म देखे हावौं। थोरिक चेत करके देखेंव तव चीन्ह डारेंव - " अरे एहर तो माया के बहुरिया भैरवी ए। कइसन सुघ्घर राग म गावत हे ओ ! भजन ल सुन के माया मेर गयेंव, बधाई देहे बर। मैं माया ल कहेंव-" नवा बहू हर गजब सुघ्घर गाथे ओ माया ! मैं अभीच्चे देख-सुन के आवत हौं " माया कहिस "वोकर एही गुन ल देख-सुन के तो तोर बेटा हर भैरवी सँग बिहाव करे हे दीदी! तैं जानत हस के नहीं,नवा-बहू हर देखे नइ सकय। वोहर अँधरी हे।"

मोला अइसे लागिस जाना - माना मोला मुर्छा आवत हे आउ मैं गिरत हावौं फेर माया हर दूनों हाथ म पोटार के  मोला सँभालिस अऊ कहिस--" तैं हर ए सोंच दीदी ! कि तोर बेटा इंजीनियर हे तव तोर बहू घलाव हर बहुत बड़ गायिका हे । तोर बेटा ल तो भइगे एही गँव के मन जानथें फेर तोर बहू हर तो सरी दुनिया नाव कमावत हावय । हमन कोनो घाटा म नइ अन दीदी ! - घी गँवागे पिसान म ।"           
        
कहानी - कुन्तला शर्मा 
मैत्रीकुंज भिलाई दुर्ग (छ.ग.)
संपर्क - 09302830030

शनिवार, 27 अगस्त 2016

छत्तीसगढ़ के तिहार देख ले


तिहार देख ले

आ हमर गांव के, तिहार देख ले।
सुग्घर लीपे-पोते, घर दुवार देख ले।

काय हरे हरेली, काय हरे तीजा-पोरा।
कोन-कोन तिहार बर, कईसन होथे जोरा।
झुमय नाचे सबो झन, मिन्झरे पिंयार देख ले।

राखी पुन्नी सवनाही , सोम्मारी कमरछठ।
रांध के खीर बरा-सोहारी, खाथे सबो छक।
झुलना झूलेआठे-कन्हैया, मिंयार देख ले।

मुसवा संग मुस्काये, गली-गली गनपति।
जस गाये दाई दुर्गा के, मनाये सरसती।
राम जी के जीतई अउ, रावन के हार देख ले।

रामधुनी रामसत्ता, भागवत रमायेन।
दियना देवारी के, जगमग जलायेन।
परसा संग माते, नाचे खेत-खार देख ले।

पूजा-पाठ बर-बिहाव, मड़ई अक्ति छेरछेरा।
सुवा-करमा नाचा-गम्मत म, बीते कतको बेरा।
नांव के तिहार नही, इहां सार देख ले।

रचना - जीतेंद्र वर्मा (खैरझिटिया)
बाल्को नगर कोरबा छत्तीसगढ़ 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

चल संगी स्कूल जाबो


चल संगी स्कूल जाबो

चल संगी स्कूल जाबो
अपन किस्मत ला अपन
हाथ ले सिरजाबो
चल संगी स्कूल जाबो

कापी किताब के नईहे चिन्ता 
सब ल स्कूल म देथे
अऊ एक जून के खाना 
सब स्कूल म जाके खाथे

नोनी ला घलो पढ़ाबो
चल संगी स्कूल जाबो

पढ़े लिखे बिना नई होवय 
मनखे के उद्धार 
नई कटय जिनगी 
हो जाही बेकार 

नवा बिहान लाबो
चल संगी स्कूल जाबो
                
रचना - जगदीश साहू "हीरा"
कड़ार भाटापारा बलौदाबाजार

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

जय जय जगन्नाथ


      जय जय जगन्नाथ

मै अनाथ, तैं जगत के नाथ।
झन छोड़, प्रभु जींयत साथ।
मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।
झन छोड़ प्रभु जींयत साथ।।

      तैं दाता, मैं हरव भिखारी।
      सुख - दुख के तैं संगवारी।
      तोर दया के दुलरवा मैं,
      तहीं ददा तहीं महतारी।।
      भटकत फिरंव, लमा हाथ।
      झन छोड़ प्रभु जींयत साथ।।
      मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।१

मन मोर परबुधिया हे,
मिठलबरा ए दुनिया हे।
सुवारथ के घपटे घटा,
अंजोर अंतस कुरिया दे।
संझा - बिहनिया नवांव माथ।
मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।
झन छोड़ प्रभु जींयत साथ।।२

      परमारथ 'हरि' काम दे,
      'अमित' ल सेवक नाम दे।
      सहजोगी सदमारग म 
      तैं सहोदरा - बलराम दे।।
      लाज राख झन बिगड़ै बात।
      मत छोड़ प्रभु जींयत साथ।।
      मैं अनाथ, तैं जगत के नाथ।।

रचना - कन्हैया साहू "अमित"
हथनीपारा भाटापारा बलौदाबाजार

गुरुवार, 30 जून 2016

पुरवईया



पूरवइया

सरर-सरर चलत पूरवइया,
            सोर मचावत आवत हे।
गरर-गरर उड़त अईसन
              धूररा टोर मचावत हे।
चम-चम चमकत बिजुरी
                मन ला चमकावत हे।
टरर-टरर करत मेचका
             आमंतरन बगरावत हे।
घड़-घड़ घुमरत बदरा
             जीव म डर हमावत हे।
झर-झर बरसत पानी
         मन म खुशी ला लावत हे।
महर-महर महकत माटी
        बिसवास मन के जागत हे।
लहर-लहर झूमत फसल
            चारो डहर लहरावत हे।
डगर-डगर चलत 'दुलरवा'
             माटी के गुन गावत हे।

रचना- श्रवण साहू 'दुलरवा'
गांव - बरगा, थानखम्हरिया बेमेतरा

झन हो अपमान


झन हो अपमान

चाहे अंग्रेजी ला मान मिले
या हिन्दी ला मिले सम्मान
फेर पांव पर के गोहरावत हंव
झन हो छत्तीसगढ़ी के अपमान

ये भुईया मा देवता अवतारे
ये भुईया के इतिहास हे महान
राम-किसन ले रामायन-गीता तक
महतारी के कतका करों बखान

भले हमन चतुरा नई होवन
फेर नई होवन मुरदा समान
अपन मेहनत के रोटी खाथन
झन समझव हमन ला बईमान

परदेसिया मन के झांसा मे आके
भाई हा भाई संग झगरा होवत हे
राजनीति के जांता मा पिसा के
छत्तीसगढ़ी भासा बड़ रोवत हे

जेला कहिथन हमला रद्दा बताही
ऊही हा रद्दा मा कांटा बोवत हे
हमर महतारी भासा छत्तीसगढ़ी
आज हमर भुईया ले खोवत हे

सनातन,पुरातन छत्तीसगढ़ी भासा
येला कोनह-कोनहा मे पहुंचाबो
सिधवा हन फेर अतको नई होन
की कोलिहा मन ला हमन डर्राबो

ये छत्तीसगढ़ के मान बढ़ाबो
छत्तीसगढ़ी ला सम्मान देवाबो
चल संगी लाज सरम छोंड के
दाई के जस ला जुरमिल गाबो

रचना - ललित साहू "जख्मी"
ग्राम - छुरा जिला - गरियाबंद


गुरुवार, 16 जून 2016

शाला प्रवेश उत्सव 2016

शाला प्रवेशउत्सव
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गरमी छुट्टी के दिन ल 
नानी नाना घर बितावन
खउं खजानी बर पईसा देवय
मिल बांट के बांटन

संगी संगवारी मन सन
तिरि पासा खेल ल खेलन
सरि मंझानिया रुख तरि
छु छुवउंल दाम पदोवन

कोसा खोजे जंगल झाड़ी
बरफ चुहके बर लावन
हरियर पिंवरी लाली लाली
रस चुचवात ले खावन

बखरी के पक्का आमा
बांस अकोसी म गिरावन
करिया करिया चिरई जाम
डारा खांदा धरके हलावन

अबतो घाम घरि दिन बितगे
ईस्कुल खुले के बेरा आगे
ईस्कुल खुलहि सोलह जुन
हंसी खुशी के दिन छागे

पुस्तक कापी नवा कपड़ा मिलहि
ईसकुल जाबोन पढ़हे बर
मन लगाके लिखबोन पढ़बो
आघु हम बढ़हे बर

खेलत कुदत ईस्कुल जाबो
सोलह जुन प्रवेशउत्सव मनाबो
गुरु गुरुदेव के आसिस पाबो
मिठ मिठई टिका गुलाल लजाबो

खिर पुड़ी अउ दार भात
मध्यान भोजन म खाबो
नवा संगी मन भरती लिहि
नवा नवा संगवारी बनाबो!!
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रचना - सोनु नेताम गोंड़ ठाकुर
(मयारूक छत्तीसगढ़ीया)
रुद्री नवागांव,धमतरी

मन के अभिलाषा


मन के अभिलाषा 
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भुईयाँ के मटासी माटी बनतेंव
कुरिया अंगना मुहाटी बनतेंव
छत्तीसगढ़ ला सजाये खातिर
डोगरी पहार घाटी बनतेंव

डूलत रहितेंव खोर अंगना मा
रंग जातेंव बाली के रंगना मा
जोर के संगी संगवारी ला
बांध लेतेंव मया के बंधना मा
गदूल बनाके डूबोतीस मोला
लईका के गोल बाटी बनतेंव।।1।।

छनकत रहितेंव मुंदराहा ले,
सुन लेतिन आरा पारा ले,
चकचक ले चमकत रहितेंव,
मजांतेव बने लीम डारा ले,
जीव कस राखे रहतिस मोला
दाई बर चुक ले साटी बनतेंव।।2।।

चारो डहर ला किंजर जातेंव,
कटकटले बंधाये भंवर जातेंव,
झुलतेंव झुलना दिनभरहा मैं
ठनठन बाजत सुग्घर जातेंव,
फभ जातेंव मै महतारी ला
बछिया बर गर घांटी बनतेंव।।3।।

डर बनतेंव मैं दुरजन खातिर,
छत्तीसगढ़ 'सिरजन' खातिर,
अंधरा कनवा के संग रहितेंव
छूटे बर मैं करजन खातिर,
कायर कपटी के बध करे बर
क्रांति कारी के लाठी बनतेंव।।4।।
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रचना - सरवन साहू
गांव-बरगा,जि- बेमेतरा 
मो- 8085104950

मंगलवार, 14 जून 2016

किसान आज अपन करम ल ठठावत हे

किसान आज अपन 
करम ल ठठावत हे
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बिहनिया ले चिरई चहकीस
किसान मजदूर बन ठन निकलीस
करमा ददरिया गीत सुनावत हे
तभो किसान अपन करम ल ठठावत हे

मजदूर धरे हे रापा,धमेला अऊ कुदारी
बेटा सुआरी संग हावय संगवारी
हटर - हटर घाम म कमावत हे
तभो ले किसान आज अपन...

अब जाके सुग्घर अन्न उपजाईस
नइ होइस त अपन करम ल ठठाइस
बने उपजे हे अन्न त खुशी मनावत हे
तभो ले किसान आज अपन...

बेलन ल भुलागे,थ्रेसर म मिंजवावत हे
अन्न दाई घर घलो नइ आवय
खेत डहर ले ही मंडी पहुचावत हे
ऐखरे सेती किसान आज अपन......
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रचना - पवन नेताम "सुरबईहा"
ग्राम - सिल्हाटी तह - स/लोहारा
जिला - कबीरधाम(छग)
मोबा - 9098766347

शनिवार, 11 जून 2016

छ.ग.के पागा कलगी भाग - 06


छत्तीसगढ़ के पागा कलगी 
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छत्तीसगढ़ी मंच द्वारा संचालित 
छत्तीसगढ़ी कविता प्रतियोगिता 
छत्तीसगढ़ के पागा कलगी भाग - 06
दिनांक - 16 से 31 मार्च 2016 तक 
विषय - चित्र आधारित(होली विसेस) 
मंच संचालक - देव हीरा लहरी 
(मिडीया प्रभारी पागा कलगी)
"छत्तीसगढ़ी भासा के प्रचारक"
निर्णायक मंडल -
1) डॉ.जे.आर.सोनी 
वरिष्ठ साहित्यकार रइपुर
2) श्री पुष्कर सिंह "राज"
वरिष्ठ साहित्यकार बालौद जिला।
विसेस - ये पईत सबले जादा 
रचना प्राप्त होईस हे कुल - 026
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विजेता - मिलन मलरिहा मलहार 
जिला - बिलासपुर छत्तीसगढ़।
पागा पहरईया के कविता ह विभिन्न 
पत्र-पत्रिका मन मे प्रकाशित के साथ -
साथ छत्तीसगढ़ी साहित्य संग्रह म भी
प्रकाशित होय हे, दैनिक समाचार पत्र
किरण दूत रायगढ़, अंजोर छत्तीसगढ़ी
मासिक पत्रिका म।विजेता ल हमर
तरफ ले बहुत बहुत बधाई अऊ
शुभकामना।
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   अटकू-बटकू, छोटकी-नोनी जऊहर धूम मचाए
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होली के रंगोली म, हुड़दंग मचे हे भारी
छोटकी-नोनी धरे गुलाल, पोतत संगी-संगवारी
अटकू-बटकू घरले निकले, तानके रे पिचकारी
एकेच पिचका म रंग सिरागे, फेर भागे दूवारी
रंग गवागे बाल्टी ले जईसे कुँआ ले अटागे पानी
पानी के होवत बरबादी, समझगे छोटकी-नोनी
पिचकारी ल फेंक सबोझन, थइली म भरे रंगोली
नांक-गाल म पोत गुलाल, खेलत हे सुक्खा-होली
छिन-छिन बटकू घर म जाके खुर्मी-ठैठरी ल लाए
संगे बतासा भजिया सोहारी अऊ पेड़ा ल खाए
अटकू-बटकू, छोटकी-नोनी जऊहर धूम मचाए...

नंगाड़ा नइ थिरके थोरकुन, बेरा पहागे झटकुन
डनाडन बाजय गमकय, सबके कनिहा मचकुन
मंगलू कहे सुन भाई कोदू, दारु लादे-ग चिटकुन
दूनोंके तमकीक-तमका म सिन्न परगे थोरकुन
झुमा-झटकी म झगरा होगे, पुलिस-दरोगा आगे
दारु-नसा के चक्कर म, किलिल-किल्ला ह छागे
मंगलू, कोदू पुलिस देख, गिरत-हपटत ले भागे
थिरकत नंगाड़ा ह फेर अपन मया-ताल गमकाए
अटकू-बटकू, छोटकी-नोनी जऊहर धूम मचाए...

बादर होगे रंग-गुलाली, सबोजघा हे लाली-लाली
हरियर-लाली रंग पेड़के, जइसे तिरंगा हर डाली
सरग-बरोबर लगे हमर छत्तीसगढ़ अंगना-दूवारी
नसा-तिहार झीन बनावा, मया-परेम बगरावा
छोटकी-छोटकू, नोनी-बाबू ल नसा झिन बतावा
नवा-पीढ़ी ल गोली-भांग, फूहड़ीपन मत सिखावा
भरभर-भरभर जरतहे होली, सत के रद्दा देखाए
भगत पहलाद के होलिका फूफू आगी म समाए
लईकामन भगवान रुप हे, कपट-छल नई भाए
दिनभर दउड़त-नाचत-खेलत जऊहर धूम मचाए...
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ये पईत कुल 26 रचना प्राप्त होईस 
अऊ जम्मो के कविता एक ले बढ़
के एक जोरदार रहिस।प्रतियोगिता 
मे भाग लेवईया जम्मो लेखक मन 
बहुत बहुत धन्यवाद आभार अऊ 
गंज अकन बधाई शुभकामना।
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रचनाकार के नाव :-
1) दिनेश देवांगन "दिव्य" सारंगढ़ 
2) महेश मंगल
3) महेन्द्र देवांगन "माटी" पंड़रिया
4) सूनील शर्मा "नील" थानखम्हरिया
5) राजेश निषाद चपरीद समोदा
6) हेमलाल साहू गिधवा नवागढ़ 
7) आशा देशमुख 
8) सोनू नेताम धमतरी 
9) ललित साहू "जख्मी" गरियाबंद 
10) देवेन्द्र ध्रुव "फुटहा करम"
11) शालिनी साहू साजा 
12) देव साहू कपसदा 
13) लक्ष्मी नारायण लहरे कोसिर 
14) मिलन मलरिहा मलहार बिलासपुर 
15) सुनील साहू निर्मोही
16) जय वीर रात्रे बेनीपाली
17) नवीन कुमार तिवारी 
18) गरिमा गजेन्द्र सरोना रायपुर 
19) सुखन जोगी डोड़की 
20) सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
21) रामेश्वर शांडिल्य 
22) अशोक साहू भानसोज 
23) सुर्यकांत गुप्ता भिलाई 
24) संतोष फरिकार "मयारू"
25) आचार्य तोषण 
26) अमन चतुर्वेदी बालौद।
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छत्तीसगढ़ी साहित्य संग्रह 
http://sahityacg.blogspot.in